AKSHYAMA

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आशय

सभी पाठकों को बार–बार, मेरा हाथ जोड़कर नमस्कार ! जैसाकि  आप सभी को विदित है कि प्रस्तुत काव्य–कृति ‘अक्ष्यमा’ नाम  से अवतरित है, आप सभी के मनोरंजन हेतु प्रस्तुत है | यह पुस्तक अक्षय मनोवृतियों पर आधारित है  |

प्रस्तुत काव्य-कृति ‘अक्ष्यमा’ में पाँच शीर्षक सम्मिलित किए गए हैं:

१. सत की लत,

२. वाणी की पहचान,

३. कर्म की गाथा,

४. भक्ति की  शक्ति,

५. बंधन की डोर।

सत्य ईश्वर का रूप है | जो हमारे साथ कभी साया बन के चलता है तो कभी छाया बन के  | कभी बुराईयों की दल–दल से हमें बचाता है तो कभी धैर्य की छाया  में रखता है  |कभी विश्वासी बन के मन को भाता है तो कभी शरीर में अपार साहस भरता है  | वह तूफानों में भी आश का दीप जलाए रखता है क्योंकि सत्य की माया कभी भी हमारी काया को व्यर्थ नहीं होने देती है |वह तो जीवन सार्थक बनाने में जुट जाती है |सत्य की मनोवृति ही हमारी वाणी को विश्वासी बनाकर हमारे लिए सत्य ज्ञान का महत्वपूर्ण स्त्रोत बनती है  |वाणी के बोल बड़े अमोल होते हैं जो मधुर भी होते हैं और कटुर भी  | उपकार की वाणी सभी के लिए हितकारी होती है जबकि स्वार्थ की वाणी छल के अँधेरों में धकेल देती है  | मानव जीवन कर्म प्रधान है  | क्योंकि मानव कर्म योनि में जन्म लेता है  |कर्म वही परम होता है जो धर्म का मार्ग चयन करता है जिसमें दया का मरम बना रहता है  |जो कर्म सभी के मन में खुशियों को भरता हैं साथ ही सभी के लिए हितों के द्वार खोलता है तथा सभी को उपकार की चाह में जीना सिखाता है, वही कर्म अच्छाईयों की चरम सीमा को स्पर्श करता है  | जोकि ईश्वर की भक्ति का माध्यम बनता है  | वास्तव में यही ईश्वर की सच्ची भक्ति है | भक्ति की शक्ति ही सभी सांसारिक विकारों से मुक्ति दिलाती है क्योंकि भक्ति की शक्ति सभी पापों को क्षीण कर देती है |यही कोई प्राणी ईश्वर की सच्ची भक्ति में लीन हो जाए तो उसका व्यर्थ अथवा खाली जीवन भी भक्ति की नोका में सवार होके भव पार हो जाता है तथा अंत में ईश्वर के परमधाम को प्राप्त करता है |

प्राणी जन्म से ही बंधन की डोर से बंधा होता है। यह बंधन की डोर भक्त को भगगन से, शिष्य को गुरु से, सन्तान को माता-पिता से, भाई को बहन से, पत्नी को पति से बांधती है। यह बंधन की डोर पकित्र यावन मनोवृत्तियों से बनी होती है तथा विश्वास अथवा आस्था से बांधती है। प्राणी समाज और प्रकृति से भी बंधा रहता है, जिसका आधार परोपकार करना है, सद्‌भावना बनाए रखना है तथा दयाभाव से परिपूर्ण प्रेमपूर्वक एक-इसरे के साथ समाज में रहना है।

अतः अंत में आप सभी का हार्दिक अभिनंदन करते हुए प्रस्तुत काव्य–कृति ‘अक्ष्यमा’ आप सभी को सादर–सादर समर्पित करता हुआ एवम समस्त त्रुटियों हेतु क्षमा,

प्रार्थी को बहुमूल्य सुझावों से आप सभी अनुगृहीत करते रहना |                                                                                 

 धन्यवाद !

रचनाकाल                                                जिराजे पंकज      

२००४                                            जिला बिजनौर, उत्तर प्रदेश                   भारत

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